1984 बैच के उत्तर प्रदेश कैडर के आईएस श्री अनंत कुमार सिंह मानव संसाधन विकास मंत्रालय के भाषा प्रभाग के नए संयुक्त सचिव बनाए गए है। श्री सिंह इससे पहले स्कुल एजुकेशन विभाग में संयुक्त सचिव थे। इनका जन्म बिहार में 06 मार्च 1959 में हुआ।
केंद्र सरकार के अंतर्गत आने वाले सभी भाषा संस्थान उनकी निगरानी में अब काम करेंगे।
ज्ञात हो कि उन्होंने अपना चार्ज डॉ अनिता भटनागर जैन (आईएअस), पूर्व संयुक्त सचिव (भाषाओं) से प्राप्त किया। डॉ जैन का तबादला दूरसंचार मंत्रालय में हो गया है।
साथ ही श्री आर.डी सहाय को निदेशक (भाषाएं) बनाया गया।
उपसचिव (भाषाएँ) हैं श्री प्रखर विप्लव गुप्ता
श्री अनंत कुमार सिंह का कार्यालय फोन नंबर है:
91-11-23381355, 91-11-23384861
Mohalla Alive
Hindi Sansthano ko Bhrashtachariyon se Bachane ki ek Muhim भ्रष्टाचार, हिंदी और हिंदी संस्थान
हिंदी के सरकारी संस्थान
केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा
केंद्रीय हिंदी निदेशालय, दिल्ली
महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा
वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग, दिल्ली
राजभाषा विभाग
Sunday
Saturday
दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो अजय तिवारी निकाले गए
नई दिल्ली, जागरण संवाददाता : दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) में शुक्रवार देर रात तक चली एक्जीक्यूटिव काउंसिल की बैठक में यौन उत्पीड़न के आरोपी एक प्रोफेसर को अनिवार्य सेवानिवृत्त करने के निर्णय पर मुहर लगा दी गई। प्रो. अजय तिवारी डीयू के हिंदी विभाग में वरिष्ठ प्राध्यापक हैं, जिनकी अभी कई वर्षो की नौकरी बाकी थी। इनके अलावा भूगर्भ विभाग के एक प्राध्यापक को प्रशासनिक अनियमितताओं के चलते पांच वर्ष तक प्रशासनिक पदों से दूर रखने का फैसला भी लिया गया है।
सूत्रों के अनुसार हिंदी विभाग में वरिष्ठ प्राध्यापक के पद पर कार्यरत प्रो. अजय तिवारी पर विभाग की एक छात्रा ने यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। आरोप था कि उन्होंने छात्रा को अश्लील एसएमएस भी भेजे। जांच में आरोपों को सही पाया गया। गत वर्ष काउंसिल ने प्रोफेसर को बर्खास्त करने का निर्णय लिया था, लेकिन नए कुलपति की नियुक्ति और नई एक्जीक्यूटिव काउंसिल ने निर्णय बदलते हुए प्रो. तिवारी को अनिवार्य सेवानिवृत्त कर दिया। इसमें उन्हें पेंशन का लाभ मिलता रहेगा।
वहीं भू-गर्भ विभाग के प्राध्यापक जेपी श्रीवास्तव पर भी प्रशासनिक अनियमितताओं के चलते उन्हें पांच साल के लिए किसी भी प्रशासनिक पद पर बने रहने की मनाही की गई है।
ईसी सदस्य डॉ. शिवा पांडे ने प्रो. तिवारी को बर्खास्त न करने पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि यह निर्णय गुरु-शिष्य परंपरा की मर्यादा को धूमिल करने वाले प्राध्यापक को राहत प्रदान करता है। ऐसा नहीं होना चाहिए
साभार
Friday
घोटाले पर रिटायरमेंट के साथ चार्ज शीट
साभार दैनिक जागरण, आगरा, 01 जुलाई 2011
घोटाले पर रिटायरमेंट के साथ चार्जशीट
आगरा, जागरण संवाददाता: वित्तीय अनियमितताओं के आरोप में घिरे केंद्रीय हिंदी संस्थान के क्लर्क हरीओम शर्मा को गुरुवार को उनकी सेवानिवृत्ति के दिन चार्जशीट जारी की गई है। मंत्रालय के निर्देश पर निदेशक प्रो. के विजय कुमार ने संस्थान आकर यह कार्रवाई की। कार्रवाई के विरोध में कर्मचारियों ने निदेशक का घेराव कर हंगामा किया। सरकारी धन के गबन के आरोप में संस्थान के रजिस्ट्रार चंद्रकांत त्रिपाठी और क्लर्क हरीओम शर्मा लंबे समय से आरोपित हैं। क्लर्क हरीओम पर हॉस्टल में आने वाले बजट में बड़ी हेराफेरी करने का गंभीर आरोप है। दोनों के खिलाफ विजिलेंस की जांच भी चल रही है। पिछले दिनों विजिलेंस की टीम ने यहां आकर दोनों से पूछताछ की थी, जिसके बाद संस्थान के कई और अफसर भी विजिलेंस के निशाने पर आ गए हैं। गुरुवार को हरीओम शर्मा सेवानिवृत्त होने थे। विजिलेंस की रिपोर्ट और मंत्रालय के निर्देश पर संस्थान के निदेशक प्रो. के विजय कुमार सुबह ही संस्थान पहुंचे और आरोपी क्लर्क के खिलाफ चार्जशीट जारी कर दी। जानकारी के बाद कर्मचारी यूनियन में खलबली मच गई। कर्मचारियों ने संस्थान में हंगामा कर निदेशक का घेराव कर लिया। इस पर निदेशक ने किसी भी रियायत से साफ इंकार कर दिया। शाम तक आरोपी कर्मचारी ने आरोप पत्र रिसीव नहीं किया। उप कुलसचिव खेम चंद ने बताया कि चार्जशीट डाक द्वारा घर भिजवाई जाएगी।
Tuesday
चोरगुरू दीपक केम बर्खास्त ( जामिया में रीडर थे)
- जामिया मिलिया इस्लामिया(JAMIA MILLIA ISLAMIA), दिल्ली के सेंटर फार कल्चर एंड मीडिया गवर्नेस विभाग के रीडर चोरगुरु डा. दीपक केम(DEEPAK KEM) को नकलकरके पुस्तकें लिखने के मामले में बर्खास्त कर दिया गया। चोरगुरु दीपक केम और चोरगुरु अनिल के राय अंकित (ANIL K RAI ANKIT)ने मिलकर कटपेस्ट करके जो किताब अपने नाम बनाई है उसका पृष्ठवार चोरी के दस्तावेज सहित खुलासा पत्रकारद्वय कृष्णमोहन सिंह व संजय देव ने अपने खोजपरक कार्यक्रम "चोरगुरू" में किया।
उसकी सीडी, जामिया मिलिया इस्लामिया के कुलपति के यहां भेजकर कार्रवाई करने की मांग की गई। जामिया के कुलपति ने जांच कराई। इसमें दीपक केम द्वारा इंटरनेट से सामग्री कटपेस्ट करके अपने नाम पुस्तकें छपवाने के कारनामे सच पाये गये। उसके बाद चोरगुरु दीपक केम की बर्खास्तगी पर कार्यकारिणी ने मुहर लगा दी। मालूम हो कि दीपक केम के पिता यूजीसी में साढ़े तीन साल पहले तक सेक्रेटरी थे। अभी यूजीसी के ही एक विभाग नाक में कुलपति रैंक के पद पर निदेशक हैं। इस पद पर उनकी नियुक्तियू.जी.सी. के तबके चेयरमैन थोराट (THORAT)ने की है। कैसे की है, इसकी स्टोरी बाद में। इसी तरह बड़े केम ने अपने पुत्र दीपक और उनकी पत्नी को किस तरह आगेबढाया है, दीपक को प्रोफेसर बनवाने के लिए कहां-कहां जुगाड़ भिड़ा रहे थे, कैसे यू.जी.सी. आदि का प्रोजेक्ट दिलवाया जाता रहा है, इसके बारे में बाद में। पहले दीपक केम के नकल करके कई किताबें लिखने के कारनामों पर।
दीपक केम ने, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय,वर्धा(MGAHU,VARDHA) के जनसंचार विभाग में अपने सजातीय पुलिसियाकुलपति विभूति नारायण राय (VIBHUTI NARAIN RAI IPS/ V N RAI) )की कृपा से जुलाई 09 में प्रोफेसर नियुक्त हुए व हेड बने, अनिल कुमार राय उर्फ अनिल के. राय अंकित( ANIL K RAI ANKIT) के साथ मिलकर PHOTOGRAPHY PRINCIPLES AND PRACTICES नामक 2500 रूपये की किताब ,कापीपेस्ट करके अपने नाम छपवाई है। इसे श्रीपब्लिशर व डिस्ट्रीब्यूटर, दरियागंज, दिल्ली ने छापा है।इसमें 22 चैप्टर हैं। ये 22 चैप्टर तीन विदेशी पुस्तकों के चैप्टर से चैप्टर तक हूबहू उतार कर बनाये गये हैं। नकलचेपी दीपक केम और अनिल के. राय अंकित की इस पुस्तक में ढेर सारी फोटो भी है। इसके चयन में भी केम ने महत्वपूर्णभूमिका निभाई थी। इसी दीपक केम के मार्फत इनके पिता यानी बड़े केम से जुगाड़ लगाकर अनिल के. राय अंकित ने यूजीसी (UGC)का एक प्रोजेक्ट लिया है।
इसमें भी एक प्रोजेक्ट फेलो को, नियुक्त करने के एक साल बैक डेट से सेलरी दिलाने का आर्डर कराने का धांधली किया है। इसमें यू.जी.सी. का एक कर्मचारी भी शामिल है। मालूम हो कि जिस तरह चोरगुरू दीपक केम के नकलचेपी कारनामे की सीडी जामिया के कुलपति के यहां भेज कर कार्रवाई करने की मांग की गई थी, उसी तरह चोरगुरू अनिल के राय अंकित के नकलची कारनामे की सीडी महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीयहिन्दी विवि, वर्धा(MGAHU,VARDHA) के कुलपतिविभूति नाराय़ण राय ( VIBHUTI NARAIN RAI IPS / V N RAI ) के यहां भेजकर कार्रवाई की मांग की गई थी। जामिया के कुलपति ने तो चोरगुरू दीपक केम को बर्खास्त कर दिया, लेकिन उसी मामले में हिन्दी विवि के कुलपति विभूति नाराय़ण राय ने अपने सजातीय चोरगुरू अनिल के राय को लगातार बचाने ,बढ़ाने और पदप्रभार देने का काम कर रहे हैं। बताया जाता है कि इसकी वजह यह है कि पुलिस अफसर विभूति नारायण राय जब वामपंथी होने का अभिनय करके वामपंथियों से जोड़-जुगाड़ लगवा कुलपति बने तो इस अपने सजातीय चोर को लाकर प्रोफेसर और हेड बना दिये। सो अब यह पुलिसिया कुलपति अपने चहेते इस चोरगुरू को बचाने-बढ़ाने में जी-जान से जुटा है। लेकिन चोरगुरू अनिल के राय अंकित के पार्टनर दीपक केम की बर्खास्तगी से अनिल के राय अंकित और उसके संरक्षक पुलिसिया कुलपति विभूति नारायण राय की असलियत तो उजागर हो ही गई।
Sunday
सांस्कृतिक पराधीनता और हिन्दी संस्थान
जगदीश्वर चतुर्वेदी। कलकत्ता विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर
इन दिनों हिन्दी हम हिन्दी वाले हिन्दी की सेवा नहीं कर रहे ।मालिकों की सेवा कर रहे हैं। विश्वविद्यालय-कॉलेज में पढ़ाने वाले या केन्द्र सरकार के संस्थानों के हिन्दी अधिकारी इस भ्रम में हैं कि वे हिन्दी की सेवा कर रहे हैं, असल में वे मालिकों की सेवा कर रहे हैं और उनकी सेवा के लिए सुंदर सेवक तैयार कर रहे हैं। हिन्दी को मालिकों की भाषा मालिकों ने नहीं हम बुद्धिजीवियों-हिन्दीसेवियों ने बनाया है।
रघुवीर सहाय ने एक कविता में लिखा है, "वही लड़ेगा अब भाषा का युद्ध/जो सिर्फ अपनी भाषा में बोलेगा/ मालिक की भाषा का एक शब्द भी नहीं/चाहे वह शास्त्रार्थ न करे जीतेगा/बल्कि शास्त्रार्थ वह नहीं करेगा/वह क्या करेगा अपने गूँगे गुस्से को वह /कैसे कहेगा ?तुमको शक है /गुस्सा करना ही/गुस्से की एक अभिव्यक्ति जानते हो तुम/वह और खोज रहा है/तुम जानते नहीं।"यानी मालिक की भाषा से बचने का कोई शास्त्र है हमारे पास ?हम क्यों और कब से मालिक की भाषा बोल रहे हैं ? हिन्दी को मालिक की दासी कैसे बनाया गया ? अरबो-खरबों रूपये खर्च करने बाबजूद हिन्दी आज भी पिछड़ी क्यों है ? इत्यादि सवालों पर गंभीरता के साथ विचार करने री जरूरत है।
हिन्दी पर केन्द्र सरकार करोड़ों रूपये सालाना खर्च करती है। केन्द्रीय हिन्दी संस्थान,केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय और वर्धा स्थित महात्मा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय से लेकर देश के विभिन्न विश्वविद्यालय और कॉलेजों में चल रहे हिन्दी विभागों के अकादमिक उत्पादन पर नजर डाली जाए तो बहुत ही असंतोषजनक तस्वीर सामने आती है। हिन्दी के समस्त कार्य व्यापार से जुड़े लोग हिन्दी के पठन-पाठन और अनुसंधान को यह मानकर करते हैं कि वे राष्ट्रभाषा का विकास कर रहे हैं और इस नाते हिन्दी तो सबकी है और उसे सबको सीखना चाहिए और हमें सिखाना चाहिए।
हिन्दी शिक्षक कक्षाओं में हिन्दी को एक नेचुरल भाषा के रूप में पढ़ाते हैं। वे हिन्दी के उद्भव और विकास को गैसपेपर मार्काशैली में पढ़ाते हैं और उसके विकास के पीछे निहित ऐतिहासिकता की हत्या कर देते हैं। वे चाहते हैं हिन्दी भारत की सार्वभौम भाषा बन जाए। इसके विकास और प्रसार के लिए वे शुद्ध व्यवहारमूलक तर्कों का इस्तेमाल करते हैं और उसके पीछे निहित ऐतिहासिकता को छिपाते हैं। वे उसे महाभाषा के रूप में भी प्रचारित करते हैं। सच यह है मध्यकाल में हिन्दी कभी भी सत्ता और न्याय की भाषा नहीं रही और आज भी नहीं है। आज भी सरकार और अदालत के सभी दस्तावेज हिन्दी में नहीं अंग्रेजी में तैयार किए जाते हैं।
इसके अलावा मध्यकाल से लेकर आधुनिककाल तक के जितने भी बड़े दार्शनिक विमर्श हैं उनमें में से कोई भी हिन्दी में नहीं हुआ। ऐसी अवस्था में हिन्दी को भारत की स्वाभाविक राष्ट्रभाषा के रूप में प्रचारित-प्रसारित करना पाखंड है। देश की स्वाभाविक भाषा वो है जिसमें न्यायपालिका और सत्ता बातें करते हैं। दर्शन का विमर्श जिसमें तैयार होता है। हमारे भाषाविज्ञानी तरह-तरह से हिन्दी के उत्थान-पतन की गाथाएं बताते हैं लेकिन किसी ने भी इस पहलू को ध्यान में नहीं रखा कि भाषा के राष्ट्रीय भाषा बनने में कौन से पक्ष प्रधान होते हैं। वे मात्र साहित्य जगत के भाषिक प्रयोगों को केन्द्र में रखकर बातें करते हैं।
वे कभी भाषा पर सत्ता,दर्शन,शास्त्रीय विमर्श और न्यायव्यवस्था की भाषा के संदर्भ में बात नहीं करते। इसके बिना भाषा का ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य नहीं बनता। मुश्किल यह है कि विमर्श जिस भाषा में हो रहा है और साहित्य जिस भाषा में लिखा जा रहा है उनमें किसी भी किस्म का आदान-प्रदान है कि नहीं ? विमर्श को सामाजिक-सांस्थानिक मानकर व्यक्ति के हवाले कर दिया गया और साहित्य को समाज के हवाले करके हमने विमर्श और भाषा के बीच में पैदा हुए अन्तर्विरोध की सृष्टि कर दी।
हाल के वर्षों में हिन्दी के प्रतिष्ठित आलोचकों ने विमर्श पदबंध को उत्तर आधुनिक मानकर जिस तरह की खिल्लियां उड़ायी हैं उससे यही पता चलता है कि हिन्दी में भाषा और विमर्श में वे अतराल मानकर चल रहे थे। हिन्दी में जिसे आलोचना कहते हैं यह आधुनिक विधा है। मध्यकाल में हिन्दी में कोई आलोचना या विमर्श नहीं है। भाषाविज्ञानी और आलोचकों ने हिन्दी भाषा पर पाठकेन्द्रित होकर लिखा। विमर्श केन्द्रित होकर कुछ भी नहीं लिखा। भाषा के वाचिक और साहित्यिक प्रयोगों का विवेचन किया। वे इन रूपों के प्रभाव या रूपान्तरण की चर्चा कम करते हैं। वे हिन्दी और अन्य भाषाओं के विकास को रेखांकित करते हैं। इस प्रक्रिया में भाषा स्वयं में एक संरचना और सिस्टम बनती चली गयी। उसके नियम बने। नियमों के आधार पर ही फैसले लिए गए। ऐसी अवस्था में भाषा में कोई भी बदलाव लाने के लिए नियमों में बदलाव जरूरी है ,नियमों में बदलाव के जरिए हम भाषा और सिस्टम के संबंधों में भी बदलाव कर सकते हैं।
मजेदार बात यह है कि हिन्दी भाषा को आधुनिककाल आते ही सभी रंगत के विचारक-समाज सुधारक और साहित्यकार राष्ट्रभाषा के रूप में देखना चाहते थे। इस चक्कर में अन्य भाषाओं और बोलियों के प्रति समानता के भाव को तिलांजलि देदी गयी और हिन्दी को विशेषाधिकार देने पर जोर दिया गया। हिन्दी की महत्ता,सत्ता और परंपरा पर अतिरिक्त बल देने के कारण भाषाविज्ञानियों और आलोचकों ने भाषा और विमर्श के क्षेत्र में जांच के काम को तिलांजलि दे दी। वे वहां सत्य की खोज में जुट गए। जबकि आलोचना का यह काम नहीं है कि वह सत्य खोजे या दावे के साथ बताए। आलोचना का काम हैं जांच करना।
आधुनिक काल आने के साथ जगदीशचन्द्र बसु,सत्येन्द्र बसु आदि की विज्ञान रचनाएं बांग्लाभाषा में आईं। गिरीन्द्रशेखर बसु ने मनोविज्ञान पर काम किया. ये लोग अपने क्षेत्र के महारथी थे। गिरीन्द्रशेखर बसु की रचनाओं से फ्रॉयड ने बहुत कुछ सीखा और मनोशास्त्र की अनेक धारणाएं बनायीं और गिरीन्द्रशेखर बसु के योगदान को माना, फ्रॉयड का उनसे नियमित पत्र-व्यवहार भी होता था। यही स्थिति अन्य वैज्ञानिकों की थी वे भी अपनी मौलिक खोजों को पहले अपनी भाषा में लेकर आए। इससे बांग्ला भाषा में विमर्श का वातावरण बना।
लेकिन हिन्दी में ऐसा अभी तक नहीं हो पाया है। दर्शन,विज्ञान,राजनीतिशास्त्र आदि में आज भी हिन्दी कम्युनिकेशन की भाषा नहीं बन पाई है। आज भी इन क्षेत्रों में पढ़ने-पढ़ाने के लिए अंग्रेजी की मदद लेनी होती है लेकिन हम मुगालते में हैं कि हिन्दी राष्ट्रभाषा है ,राष्ट्रीय विमर्श की भाषा है।
सच यह है हिन्दी में एक भी ऐसा विमर्श नहीं हुआ जिसने भारत या उसके बाहर प्रभाव छोड़ा हो। जबकि संस्कृतभाषा के साथ ऐसा नहीं है। बांग्लाभाषा के साथ ऐसा नहीं है। संस्कृत के साहित्य,न्याय-दर्शन,नीतिशास्त्र,काव्यशास्त्र,नाट्यशास्त्र आदि तमाम क्षेत्रों का आज भी सारी दुनिया में अध्ययन-अध्यापन होता है। क्योंकि संस्कृत सिर्फ साहित्य की भाषा नहीं थी,वह विज्ञान,गणित,दर्शन,न्याय,कामशास्त्र आदि जटिततम विषयों के विमर्श की भाषा भी थी ।
हिन्दी की स्थिति इसकी तुलना में बेहद खराब है। हिन्दी ने अपने को साहित्य, बातचीत,सरकारी कामकाज की भाषा और मीडिया की भाषा तक सीमित रखा है। इससे हिन्दी का रुका है। हिन्दी अभी तक विचार,विज्ञान,तकनीक आदि की भाषा क्यों नहीं बन पायी है ? हमारे हिन्दी संस्थानों की इसमें बड़ी भूमिका है। हिन्दी के बुद्धिजीवियों की ,खासकर प्रोफेसरों की बड़ी भूमिका है।
हिन्दी के प्रोफेसरों और हिन्दी ऑफीसरों ने जो संसार रचा है वह भाषा का सीमित संसार है। हिन्दीवाले को हिन्दी के विकास के नाम पर कुछ भी करना होता है तो वे सेमीनार करते हैं और स्वयं मंच पर बैठ जाते हैं। यानी हिन्दी बुनियादी तौर पर सेल्फ -प्रमोशन स्कीम का हिस्सा है। निजी उत्थान और निजी महिमा को वे राष्ट्रीय उत्थान और हिन्दी महिमा समझते हैं। जबकि इसका हिन्दी विकास से कोई संबंध नहीं है।
हिन्दी आलोचकों-प्रोफेसरों और साहित्यकारों को साहित्य और कम्युनिकेशन माध्यमों में हिन्दी की सत्ता का विस्तार खूब आनंदित करता है। जबकि इस विस्तार से भाषा समृद्ध नहीं होती। पता करें कि मासमीडिया और सूचना तंत्र के व्यापक विकास के बाबजूद हिन्दी कितनी समृद्ध हुई है ? सच यह है कि हिन्दी के अनेक बड़े अखबार अभिव्यक्ति के लिए अंग्रेजी पदबंधों के अनिवार्य प्रयोग पर बल दे रहे हैं। हिन्दी की दयनीय अवस्था का अनुमान इससे ही लगाया जा सकता है कि केन्द्र सरकार की कोई भी नीति या पत्र पहले हिन्दी में नहीं लिखा जाता। सारे सरकारी तंत्र के संप्रेषण की भाषा अंग्रेजी है। रघुवीर सहाय की कविता है 'हिन्दी '- 'पुरस्कारों के नाम हिंदी में हैं/ हथियारों के अंग्रेज़ी में /युद्ध की भाषा अंग्रेजी है /विजय की हिन्दी।"एक अन्य कविता में रघुवीर सहाय ने लिखा है, "अँग्रेजों ने अँग्रेजी पढ़ाकर प्रजा बनाई/ अँग्रेजी पढ़ाकर अब हम प्रजा को राजा बना रहे हैं।"
आधुनिककाल में हिन्दी के विकास का जो रास्ता हमने चुना है वह बाजार , महानगर,विश्वविद्यालय और कम्युनिकेशन मीडियम केन्द्रित है। इन चारों का हमारे देश आर्थिक विकास के मॉडल से गहरा संबंध है। इसमें बुनियादी चीज है हिन्दी की "शर्तयुक्त परिस्थिति"। यह "शर्तयुक्त परिस्थिति" क्या है ? मसलन्, केन्द्र सरकार के ऑफिस में हिन्दी में काम करना होगा इसके लिए हिन्दी अधिकारी,हिन्दी टाइपिस्ट आदि रखो। काम नहीं करना है तो कोई जरूरत नहीं है। चूंकि हिन्दी राजकाज की भाषा या राष्ट्रभाषा है तो हिन्दी के विभाग तो होने चाहिए। ये "शर्तयुक्त परिस्थिति" अपने आपमें पराधीनता की द्योतक हैं। यानी शर्तयुक्त परिस्थिति को सांस्कृतिक पराधीनता कहते हैं। इसमें काम करने वाले के सामने दो ही संभावनाएं बचती हैं ,प्रथम, परिस्थिति के अंतर्गत स्पष्ट विकल्पों में चयन,दूसरा, इस शर्तयुक्त परिस्थितियों को बदलकर कार्य की अन्य संभावनाओं की खोज करना। हिन्दीवालों ने पहली स्थिति में अपने को ढ़ाल लिया है,इसका दुष्परिणाम है कि हिन्दी आज जनता की कम सरकार भाषा के रूप में ज्यादा जानी जाती है। इसी स्थिति को ध्यान में रखकर रघुवीर सहाय ने एक बड़ी ही शानदार कविता लिखी है 'हिन्दी'- लिखा,
"हम लड़ रहे थे/समाज को बदलने के लिए एक भाषा का युद्ध/ पर हिन्दी का प्रश्न अब हिन्दी/का प्रश्न नहीं रह गया/हम हार चुके हैं/अच्छे सैनिक/अपनी हार पहचान/अब वह सवाल जिसे भाषा की लड़ाई हम कहते थे/ इस तरह पूछः/हम सब जिनकी ख़ातिर लड़ते थे/ क्या हम वही थे ?/या उनके विरोधियों के हम दलाल थे/- सहृदय उपकारी शिक्षित दलाल ?/आज़ादी के मालिक जो हैं ग़ुलाम हैं/उनके गुलाम हैं जो वे आज़ाद नहीं/हिन्दी है मालिक की/तब आजादी के लिए लड़ने की भाषा फिर क्या होगी ?/ हिन्दी की माँग/ अब दलालों की अपने दास-मालिकों से/एक माँग है/बेहतर बर्ताव की/अधिकार की नहीं/वे हिन्दी का प्रयोग अंग्रेजी की जगह/करते हैं/जबकि तथ्य यह है कि अंग्रेजी का प्रयोग/उनके मालिक हिन्दी की जगह करते हैं/दोनों में यह रिश्ता तय हो गया है/जो इस पाखण्ड को मिटाएगा/हिन्दी की दासता मिटाएगा
/वह जन वही होगा जो हिन्दी बोलकर/रख देगा हिरदै निरक्षर का खोलकर।"
Saturday
हिंदी संस्थान में विजिलेंस छापा
आगरा, जागरण संवाददाता: अहिंदी भाषीय क्षेत्रों में हिंदी के प्रसार को कार्यरत केंद्रीय हिंदी संस्थान में वर्ष 2001 से लेकर 2005 तक लाखों की सरकारी रकम का बंदरबांट किया गया। फर्जी ढंग से नौकरियां दी गईं। शिकायत पर मंगलवार को मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय के विजिलेंस की टीम ने संस्थान में छापा मारा। जांच के दौरान कुछ रिकार्ड गायब पाए गए हैं।
मंत्रालय के अवर सचिव केपीजे जैराल्ड और विजिलेंस ऑफीसर मनोज शर्मा ने दोपहर 12 बजे संस्थान में कार्रवाई शुरू की। टीम ने कुलसचिव से वार्ता के बाद शिकायत संबंधी सभी लेखा रिकॉर्ड तलब किए। इसके बाद एक-एक कर जांच से जुड़े अधिकारियों और बाबुओं के बयान लिए गए। श्री जैराल्ड ने बताया कि संस्थान में वर्ष 2001 से लेकर 2005 तक जो भी वित्तीय भुगतान हुए, उसमें बड़ी गड़बड़ी की शिकायतें हैं। उक्त अवधि से संबंधित रिकॉर्ड भी गायब कर दिए गए हैं।
रजिस्ट्रार सहित चार पर जांच
अवर सचिव के मुताबिक रजिस्ट्रार प्रो. चंद्रकांत त्रिपाठी, क्लर्क हरीओम शर्मा सहित चार लोगों के खिलाफ जांच शुरू हुई है। इन पर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप हैं। अवर सचिव ने बताया कि आरोपियों के भी बयान लिए हैं। हालांकि जांच पूरी होने के बाद ही कुछ कहा जाएगा।
इन बिंदुओं पर भी कार्रवाई
टीम ने शिकायत के जिन बिंदुओं पर कार्रवाई की उसके अंतर्गत इस अवधि के दौरान छात्रावास के लिए हर साल आने वाली लगभग चार लाख की रकम ठिकाने लगाई गई। सामान की खरीद की जगह फर्जी ढंग से बिलों का भुगतान हुआ, वहीं कई लोगों को मुख्यालय से लेकर मंत्रालय तक फर्जी तरीके से नौकरी दिलाए जाने के भी आरोप हैं। टीम ने इन सभी बिंदुओं पर जांच पड़ताल की।
मेरे खिलाफ साजिश
इस संबंध में रजिस्ट्रार चंद्रकांत त्रिपाठी का कहना है कि मेरे खिलाफ संस्थान के ही अन्य लोगों ने साजिश रची है। झूठी शिकायत पर हो रही विजिलेंस जांच के बाद सब स्पष्ट हो जाएगा।
Tuesday
हिंदी को विश्व में फैलाना है तो उसे मसखरों के हाथ में सौंप देना चाहिए
दरबारी लाल
दरबारियों की जय हो! : हिन्दी किस तरह लूट-खसोट का माध्यम हो गई है। इसका ताजा उदाहरण 11 से 13 मार्च के दौरान अशोक चक्रधर के नेतृत्व में इग्लैंड की यात्रा पर गया हिन्दी कवियों और सेवियों का आठ सदस्यीय शिष्ट मंडल है। यह वहाँ चतुर्थ अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन यूके में भाग लेने गया जो कहने मात्र को अंतरराष्ट्रीय था क्योंकि इसमें भारत के अलावा रूस से तीन हिन्दी विद्वानों ने भाग लिया था।
अन्य सभी लोग ब्रिटेनवासी भारतीय थे। इसमें जाने का बहाना गजब का था। वह था विदेशों में हिन्दी शिक्षण की समस्या और होली मिलन व हास्य कवि सम्मेलन। संवाद तो सिर्फ एक दिन भी पूरा नहीं हुआ बाकी दिन अंतरराष्ट्रीय हास्य कवि अशोक चक्रधर छाये रहे। इससे एक बात तो सिद्ध होती ही है कि आज हिन्दी को अगर विश्व में फैलाना है तो उसे मसखरों के हाथों में सौंप दिया जाना चाहिए और भारत सरकार ने लगभग यही कर दिया है। यही कारण है कि हास्य कवि अशोक चक्रधर पिछले तीन साल में हिन्दी के नाम पर चलने वाली चार-चार संस्थाओं का नेतृत्व कर रहे हैं। केंद्रीय हिन्दी संस्थान आगरा के अलावा वह दिल्ली की हिन्दी अकादमी के भी उपाध्यक्ष हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के इंस्टीट्यूट फार लाइफ लांग लर्निंग में हिन्दी के प्रोफेसर हैं और विदेश विभाग के इंडियन काउंसलि आफ कल्चरल रिलेशंस में भी हिन्दी के नाम पर पहुंच बनाए हुए हैं। साफ है कि शासकों को सिर्फ चाटुकारों की जरूरत है। इसके अलावा पिछले कुछ दशकों में हमारे नेताओं के बौद्धिक व नैतिक स्तर में जो गिरावट आई है यह उसका भी प्रतीक है।
महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी प्रेमचंद, निराला और महादेवी जैसे लेखकों को व्यक्तिगत स्तर पर जानते थे। आज के नेता न तो हिन्दी की रचनात्मकता से परिचित हैं, न ही उसके लेखकों के बारे में जानते हैं। वे हिन्दी के महत्व को लेकर किसी तरह से चिंतित नहीं हैं। हिन्दी एक ऐसा खटारा है जिसमें ऐसे किसी भी व्यक्ति को कभी भी बैठाया जा सकता है जिसके लिए और कहीं जगह नहीं निकल रही हो। यह काम एनडीए के दौरान भी उसी गति से हो रहा है। पर मजे की बात यह है कि वृहत्तर हिन्दी समाज को इससे कोई लेना-देना नहीं है। वैसे भी हिन्दी को अपढ़ों और कुसंस्कृत लोगों की भाषा माना जाता है। जो आज की दुनिया में आगे बढ़ने में सहायक नहीं है।
इसका फायदा किस तरह से लोग उठा रहे हैं इसका उदाहरण अशोक चक्रधर से बेहतर कौन हो सकता है जो इस बीच कांग्रेसियों के प्रिय कवि बने हुए हैं। होली की ठिठोली के साथ हिन्दी की चोली में हाथ डालने जो लोग ब्रिटेन की यात्रा पर गये थे उनमें चक्रधर के अलावा सुधीश पचैरी, प्रेम जनमेजय, दिविक रमेश, बालेन्दु शर्मा दधीच, रामचंद्र राय, बागेश्रवरी चक्रधर और अजय गुप्ता थे।
प्रेम जनमेजय और दिविक रमेश की प्रतिष्ठा से हिन्दी जगत परिचित हैं ही। बालेन्दु शर्मा ने चक्रधर के साथ मिलकर कंप्यूटर को हिन्दी में बदलने का बीड़ा उठाया हुआ है। रामचंद्र राय चूंकि शांति निकेतन में हैं इसलिए अगर उन्हें रवीन्द्रनाथ ठाकुर की परंपरा में न मानें तो भी वह हजारी प्रसाद द्विवेदी की गद्दी के वारिस तो कहे ही जा सकते हैं। अशोक चक्रधर की प्रतिभा स्वयं सिद्ध ही नहीं वैश्विक है, यह बतलाने की जरूरत नहीं है। केंद्रीय हिन्दी संस्थान के उपाध्यक्ष होने के नाते इस प्रतिनिधि मंडल में होने के उनके अधिकार को कैसे चुनौती दी जा सकती है। इस पर भी कहा नहीं जा सकता कि हिन्दी समाज बागेश्वरी चक्रधर की प्रतिभा से कितना परिचित है। चूंकि हिन्दी का हर मुद्दरिस जन्मजात कवि या लेखक होता है और बागेश्वरी जी भी दिल्ली के एक कालेज में हिन्दी पढ़ाती हैं इसलिए उनकी रचनात्मकता पर शंका की गुंजाइश नहीं बचती।
प्रेम जनमेजय और दिविक रमेश की प्रतिष्ठा से हिन्दी जगत परिचित हैं ही। बालेन्दु शर्मा ने चक्रधर के साथ मिलकर कंप्यूटर को हिन्दी में बदलने का बीड़ा उठाया हुआ है। रामचंद्र राय चूंकि शांति निकेतन में हैं इसलिए अगर उन्हें रवीन्द्रनाथ ठाकुर की परंपरा में न मानें तो भी वह हजारी प्रसाद द्विवेदी की गद्दी के वारिस तो कहे ही जा सकते हैं। अशोक चक्रधर की प्रतिभा स्वयं सिद्ध ही नहीं वैश्विक है, यह बतलाने की जरूरत नहीं है। केंद्रीय हिन्दी संस्थान के उपाध्यक्ष होने के नाते इस प्रतिनिधि मंडल में होने के उनके अधिकार को कैसे चुनौती दी जा सकती है। इस पर भी कहा नहीं जा सकता कि हिन्दी समाज बागेश्वरी चक्रधर की प्रतिभा से कितना परिचित है। चूंकि हिन्दी का हर मुद्दरिस जन्मजात कवि या लेखक होता है और बागेश्वरी जी भी दिल्ली के एक कालेज में हिन्दी पढ़ाती हैं इसलिए उनकी रचनात्मकता पर शंका की गुंजाइश नहीं बचती।
बड़ी बात यह है कि वह अशोक चक्रधर की पत्नी हैं इसलिए प्रतिनिधि मंडल में कवि के रूप में उनके शामिल होना लगभग स्वाभाविक ही लगने लगता है। आखिर अर्धांगिनी हैं। अशोक जी के संपर्क से किसी का भी कवि बन जान सहज संभाव्य है, फिर यह तो घरेलू मामला है। अगर पति का खर्च केंद्रीय हिन्दी संस्थान के खाते से आया तो पत्नी के व्यय की व्यवस्था आईसीसीआर ने की। पारिवारिक संबंधों को दृढ़ करने और विदेश में जा कर पतियों को अकेलेपन का लाभ उठाकर भटकने से रोकने में आईसीसीआर की इस भूमिका की जितनी सराहना की जाए, थोड़ी है। लगता है वे हिन्दी वालों के रोमांटिक मिजाज से खासे वाकिफ हैं, विशेष कर जब वे भारत भूमि से बहार होते हैं। आखिर इस संस्था का काम भारतीय संस्कृति का प्रचार-प्रसार जो है।
पर आश्चर्य यह है कि होली मिलन और हिन्दी प्रचार के इस अनूठे कार्यक्रम में आचार्य प्रवर और आलोचक श्री सुधीश पचौरी की क्या भूमिका रही हो। फिलहाल इस पाठकों की कल्पना पर छोड़ने में ही भलाई है। वैसे सुना जाता है हाथरस और आसपास के लोगों में मसखरेपन की प्रतिभा जन्मजात होती है। फिर मित्र चक्रधर ने भी बाकी जुगाड़ के अलावा पचौरी को कुछ टिप्स तो दिए ही होगें। दोस्त हो तो ऐसा या दोस्ती हो तो ऐसी।
पर केंद्रीय हिन्दी संस्थान के मोर्चे से खबर है कि फिलहाल निदेशक की नियुक्ति को मामला अटक गया है। एक सांसद को भेजे पत्र में मानव संसाधन विकास मंत्री ने यह जानकारी दी है। लगता नहीं कि उपाध्यक्ष के मनचाहे मोहन जी की वंशी बज पायेगी। अब उपाध्यक्ष की कोशिश यह रहेगी कि इस पर पर फिलहाल कोई नियुक्ति न हो, कम से कम उनमें से तो कोई न आये जो पैनल मैं हैं और सेवा निवृत के. विजय कुमार को एक्सटेंशन पर रख लिया जाए। अगर ऐसा है तो इससे ज्यादा शर्मनाक कुछ नहीं होगा। पिछले दो वर्षों से संस्थान में कोई निदेशक नहीं है इसलिए जरूरी है कि पूरी सर्च कमेटी नये सिरे से अपनी राय दे या फिर चुनिंदा उम्मीदवारों के जिस पैनल की संस्तुति की गई है उसी में से अगले निदेशक की नियुक्ति हो।
कमेंट (Comments)
written by चंद्रकांत त्रिपाठी, June 25, 2011 अशोक चक्रधर और वर्धा के कुलपति वी एन राय एक ही सिक्के के दो पहलू हैं ...वी एन राय विदेश से हिन्दी के कुछ शिक्षकों को बुलवाते हैं और उनके सामने अशोक चक्रधर देश की और देश की नीतियों की बखिया उधेड़ते हैं और उसके बाद वर्धा के कुलपति वी एन राय विश्वविद्यालय के ब्लॉग हिन्दी-विश्व पर बड़ी ही बेशर्मी से देश और सरकार की खुलेआम आलोचना को प्रकाशित करते हैं .अशोक चक्रधर कहते हैं " कठिनाई केवल आर्थिक या सरकारी नीतियों से संबंधित नहीं है, यद्यपि भारत सरकार के अनेक निर्णय हिन्दी को क्षति पहुँचाने वाले रहे हैं। आज भी सरकार चेती नहीं है – वह अवैज्ञानिक और अधकचरे प्रयोगों को बढ़ावा दे रही है।"
यह सारा तमाशा महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय , वर्धा में विश्वविद्यालय के कुलपति वी एन राय की उपस्थिति में विदेशी शिक्षकों के सामने होता है । नियमानुसार कोई सरकारी कर्मचारी सरकार की नीति की आलोचना नहीं कर सकता ना ही ऐसी कोई आलोचना किसी सरकार द्वारा संचालित वेब साइट या ब्लॉग पर प्रकाशित की जा सकती है । पूरा विवरण जानने के लिए नीचे दिए वेब लिंक को url पर कॉपी पेस्ट करके पढ़ें
http://hindi-vishwa.blogspot.com/2011/01/blog-post_04.html
written by anil pande, May 17, 2011 यह सारा तमाशा महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय , वर्धा में विश्वविद्यालय के कुलपति वी एन राय की उपस्थिति में विदेशी शिक्षकों के सामने होता है । नियमानुसार कोई सरकारी कर्मचारी सरकार की नीति की आलोचना नहीं कर सकता ना ही ऐसी कोई आलोचना किसी सरकार द्वारा संचालित वेब साइट या ब्लॉग पर प्रकाशित की जा सकती है । पूरा विवरण जानने के लिए नीचे दिए वेब लिंक को url पर कॉपी पेस्ट करके पढ़ें
http://hindi-vishwa.blogspot.com/2011/01/blog-post_04.html
SAHITYA MAFIA
420+420=840 आचार्य प्रवर , आलोचक सुधीश पचौरी Har Sabzi Ka Aalu Hai.
Pata Nahi DU ME Padhata Kab Hai.
Newspapers, TV Par Jagah Gher Kar Patrakaron Ka Haque Marne Wala पचौरी & Co. हिन्दी के नाम पर PURE DESH aur tax payers KO Chuna Laga Rahe Hain.
Ye Sab KE SAB SAHITYA MAFIA HAIN.
INHE Janahit Me DAUDA-DAUDA KAR MARNA CHAHIYE.
420+420=840 आचार्य प्रवर , आलोचक सुधीश पचौरी Har Sabzi Ka Aalu Hai.
Pata Nahi DU ME Padhata Kab Hai.
Newspapers, TV Par Jagah Gher Kar Patrakaron Ka Haque Marne Wala पचौरी & Co. हिन्दी के नाम पर PURE DESH aur tax payers KO Chuna Laga Rahe Hain.
Ye Sab KE SAB SAHITYA MAFIA HAIN.
INHE Janahit Me DAUDA-DAUDA KAR MARNA CHAHIYE.
Subscribe to:
Comments (Atom)

कारण: इस प्रकार है:
१. दिल्ली में संस्थान के अंदर संपादन के नाम पर सरकारी खर्चे पर शराब नहीं पी जा सकती।
२. दिल्ली में संपादन के नाम पर ५ सितारा होटल में परस्त्रियों के साथ हमबिस्तर नहीं हो सकते।
३. दिल्ली में कार्यक्रम होने पर टी.ए. डीए के नाम पर मोटी रकम नहीं बटोरी जा सकती।
और आखिर में इस संपादक मंडल में संस्थान के कुख्यात हवाईयात्राखोर शामिल हैं (मुफ्त हवाईयात्री दिखी नहीं कि टूट पड़े)
धन्य हों ये विशेषज्ञ जिन्होंने अपनी अय्याशी का ऐसा नायाब तरीका निकाला।
इन सब जनहित नंगा कर के मारना चाहिए