हिंदी के सरकारी संस्थान

केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा

केंद्रीय हिंदी निदेशालय, दिल्ली

महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा

वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग, दिल्ली

राजभाषा विभाग

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ऐसे चलते हैं हिंदी के संस्थान भाग - 2

ऐसे चलते हैं हिंदी के संस्थान भाग – 2 
एक संवाददाता 
हिन्दी संस्थानों की बदहाली के किस्से को आगे बढ़ाते हुए, कुछ न्ई जानकारियों को रोशनी में लाना जरूरी हो गया है। आगरा के केंद्रीय हिंदी संस्थान में व्याप्त अव्यवस्था और भ्रष्टाचार को हिन्दी जगत के लोग बंद आँखों से भी देख सकते हैं। इसके लिए किसी विशेष चश्में की जरूरत नहीं है। पिछली तीन वर्षों से कठपुतली निदेशकों के भरोसे चल रहे केंद्रीय हिन्दी संस्थान में चोरों और डाकूओं की पौ बारह हो रही है। संस्थान के पूर्व निदेशक नित्यानंद पाण्डेय के पद छोड़ने के बाद से ही संस्थान में मनमानी, लूट-खसोट का तांडव और मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अधिकारियों की दादागिरी का जो दौर चला है, वह थमने का नाम ही नहीं ले रहा। संस्थान के निदेशक और उपाध्यक्ष पद पर नियुक्ति के लिए होने वाली धांधलियों के बारे में आप पहले ही पढ़ चुके हैं। मंत्रालय की मिलीभगत से निदेशक शंभूनाथ के बाद सबसे पहले चार्ज वरिष्ठतम प्रो रामवीर सिंह को मिला और फिर बाद में कांग्रेस पार्टी के ’जय हो’ फेम चारण-कवि अशोक चक्रधर की कृपा से हिंदी में मैट्रिक पास प्रो के. बिजय कुमार संस्थान के निदेशक बने। संस्थान के निदेशक नियुक्ति प्रक्रिया को बार-बार बोझिल बनाकर मंत्रालय अपनी पकड़ ढीली नहीं करना चाह रहा। परन्तु उसकी ठीक नाक के नीचे ही संस्थान में गड़बड़ घोटाला जारी है।

Dr Chandrakant Tripathi Registrar KHS
 
संस्थान की इस गफलत में उसे अपनी लूट, हवस और मनमानी का शिकार बनाया संस्थान के फर्जी ड्रिगीधारी रजिस्ट्रार चंद्रकांत त्रिपाठी और उनके गिरोह ने। इन अगड़ी जाति के चोरों के नेता और दिल्ली, जयपुर, बंग्लुरू, नौएडा, देहरादून, चेन्नई, पूना आदि में न जाने कितनी बेनामी ज़मीनों और फ्लेटों के मालिक संस्थान के रजिस्ट्रार का नाम शुरू से ही संस्थान के निदेशकों की बेइज्जती और वहाँ गुंडाराज चलाने के लिए बदनाम है। किसी अदने कर्मचारी को सरेआम पीटना या पिटवाना इन त्रिपाठी का दाएँ हाथ का खेल है। इस प्रकार की उनके गर्म मिज़ाज की घटनाओं की खबर आए दिन आगरे के अखबारों में निकलती रहती है। ज्ञात हो कि कुछ वर्ष पहले इसी रजिस्ट्रार ने असम विश्वविद्यालय से आए संस्थान के निदेशक प्रो नित्यानंद पाण्डेय की जमकर पिटाई और बेइज्जती की थी और मामला पुलिस तक जा पहुँचा था। जिस कारण अंतत: प्रो. पाण्डेय ने निराश होकर संस्थान छोड़ दिया। बाद में इसी गिरोह ने निदेशक शंभूनाथ को जान से मारने की धमकी का पत्र लिखवाया था। फेरहिस्त बहुत लंबी है। 
सक्षम निदेशकों की गैरमौजूदगी में त्रिपाठी गिरोह ने पूरे संस्थान पर जैसे अपना अंधा राज स्थापित कर लिया है। माना जाता कि पिछले दस वर्षों ने इस रजिस्ट्रार ने फर्जीवाड़ा कर करोड़ों रुपए का धन बटोर लिया है और वे पिछले कई दिनों से अपनी पत्नी को संस्थान में नौकरी दिलवाने की जुगाड़ में लगे हुए हैं। संस्थान में चलने वाले बिजली-जनरेटर के तेल, साजों सामान की खरीददारी, विदेशी विद्यार्थियों के हवाई टिकट की खरीद, सेमिनार/समारोह आयोजन से लेकर शिलांग में स्थित संस्थान के सेंटर के भवन- निर्माण में इस गिरोह ने करोड़ों रुपए का कमीशन खाया है। यह आश्चर्य की बात नहीं है कि संस्थान में होने वाली पढ़ाई का स्तर दिन पर दिन गिरता जा रहा है जब रजिस्ट्रार और शिक्षक मिलकर संस्थान को लूटने की योजना से दिन-रात जुड़े हों। 
मिली जानकारी के अनुसार इसी गिरोह ने रिश्वत लेकर संस्थान के सभी केद्रों पर अपने सगे-संबंधियों या क्षेत्रीय लोगों को संविदा पर नियुक्त करवाया हुआ है। अब इस गिरोह द्वारा संविदा पर नियुक्ति पाए हुए कर्मचारी किसी प्रोफेसर / प्रभारी के सामने खुलेआम जातिसूचक शब्दों का प्रयोग करने से गुरेज नहीं करते। जब सईंया भए कोतवाल तो डर काहे का। 
संस्थान को केंद्र सरकार से हर साल मिलने वाले बजट में से करोड़ों डकार जाने वाले इस त्रिपाठी गिरोह ने फर्जीवाड़ा करके न जाने कितनों बैंको से अवैध लोन लिया हुआ है। संस्थान के सहकारी ऋण समिति के नाम पर हर साल कर्मचारियों का जमा पैसा यह गिरोह अवैध तरीकों से आगरा , मथुरा और बनारस की सूद की मंडियों में लगा रहा है। मनमानी और घोटाले के ये हाल है कि संस्थान द्वारा हर वर्ष लाखों रुपए भवन रख-रखाव में व्यय किए जाते है परन्तु त्रिपाठी गिरोह की कारस्तानी देखिए कि संस्थान का प्रत्येक भवन जीर्ण-शीर्ण अवस्था में पड़ा हुआ है। शौचालयों की हालत यह है कि आवारा जानवर प्राय: यहाँ मल_मूत्र विसर्जन करते नज़र आते हैं। संस्थान को दीमक की तरह चाटना चाह रहा यह गिरोह अपनी काली करतूतों के कारण मंत्रालय की आखों की किरकिरी बना हुआ है। अब नौबत यह है कि संस्थान के हर काम में मंत्रालय अड़ंगा लगा रहा है। 
अपने घर में अवैध बिजली और संस्थान के खर्चे पर छह-छह एसी मशीनों का इस्तेमाल करने वाले रजिस्ट्रार त्रिपाठी को इस संबंध में मंत्रालय की विजिलेंस कमेटी का नोटिस पहले ही मिल चुका है। संस्थान को अपने घर की मुर्गी समझने वाले रजिस्ट्रार ने संस्थान के खर्चे पर अवैध तरीकों से चार-चार नौकर रखे हुए है और वे अपने निजी-वाहन चलवाने का काम एक प्रांतीय रक्षक दल के जवान से संस्थान के वेतन पर करवा रहे हैं। खुलेआम बंदूको के साये में चलने वाले इस गिरोह की हरकते अन्ना हाजरे को भी रूला देंगी। 
अब देखना यह है कि मंत्रालय के आई.ए.एस अमित खरे के नेतृत्व में गठित विजिलेंस कमेटी इस गिरोह के परों पर कब कैंची चलाती है। संस्थान की आगरा में स्थापना करने वाले महान हिंदी सेवी श्री मोटूरी सत्यनारायन ने यह कभी नहीं सोचा होगा कि चंद लोगों के स्वार्थपरकता के कारण संस्थान रसातल में चला जाएगा। 

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