एक संवाददाता
यह बात सच है कि आज सरकारी संस्थानों में हिंदी पढ़ने वाले नब्बे फीसदी छात्र समाज के पिछड़े और दलित वर्गों से ताल्लुक रखते हैं। ये छात्र मेहनतकश परिवारों के बाशिंदे होते हैं जो बचपन से जवानी तक अल्पतम सुविधाओं में पलकर शहरों में पढ़ने के लिए आते हैं। भारत के दूर-दराज के ईलाकों से आने वाले यही छात्र जब भारत सरकार द्वारा संचालित केंद्रीय हिंदी संस्थान जैसे शिक्षण संस्थाओं में पहुँचते हैं तो उन्हे पता चलता है कि उनके हक की रोटी वहाँ के कुछ सफेदपोश खा रहे हैं।
मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा वंचित समाज के इन छात्रों के लिए करोड़ों रुपए केंद्रीय हिंदी संस्थान को दिए जाते हैं। पर विडंबना देखिए कि यहाँ के स्टूडेंट टूटे-फूटे बिस्तरों पर सो कर और लंगड़ी कुर्सियों पर बैठकर पढ़ाई पूरी करते हैं। उन्हे दोयम दर्जे के खाने से अपना पेट भरना पड़ता है। हॉस्टल, भोजनकक्षों और लेक्चर हॉलों के हालात तो इतने खस्ता है कि किसी भी भलेमानस को शर्म आ जाए। छात्रावास के रसोईघर नारकीय हो चले हैं। गुसलखाने तो ऐसे हैं कि कोई गलती से चला जाए तो बीमार हो कर ही लौटे। सर्दियों में ओढ़ने के लिए छात्रों को मिलने वाली रजाइयाँ गंदली और फटी हुई हैं। खेल के मैदान और बाग-बगीचे सूखे और उजड़े पड़े है। पीने के पानी तक की कोई स्थाई सुविधा नहीं है। नालियाँ जगह-जगह खुली पड़ी हैं जिनसे मानव मल खुले में बहता रहता है। जनरेटर है पर रोज कई-कई घंटे बिजली नादारद रहती है। नए ज़माने की कंप्यूटर जैसी सुविधाओं के बारे में तो भूल ही जाईए। भेड़-बकरियों की तरह एक ही कमरे में छह-छ्ह छात्रों को रहने के लिए मजबूर किया जाता है। समस्याओं के लिए छात्रों के शिकायत करने पर बदमिज़ाज रजिस्ट्रार द्वारा उन्हें घर वापस भेजने या परीक्षा में फेल करवा देने की घुड़की सुनाई जाती है।
पर इन सब से बेपरवाह संस्थान के हुक्मरान और फर्जी डिग्रीधारी आका संस्थान के खज़ाने से लाखों रुपए खर्च कर विदेश यात्रा और पंचसितारा होटलो में अय्याशी करने में ही संस्थान का माल-असबाब लुटाने पर तुले हैं। मिली सूचना के अनुसार पिछले चार वर्षों में संस्थान के खर्चे पर संस्थान के उपाध्यक्ष प्रो. अशोक चक्रधर, संस्थान के निदेशक प्रो. के बिजय कुमार समेत फर्जी डिग्रीधारी रजिस्ट्रार ने श्रीलंका, मॉरिशस, जापान, चीन, ब्रिटेन, रूस आदि देशों की यात्रा की है। उपाध्यक्ष तो अपने पाँच सितारा होटलो के प्रेम में पहले से बदनाम हैं ही, विदेश जाने की अपनी भूख को भी वे संस्थान के खर्चे पर ही शांत कर रहे हैं। सुत्रों से पता चला है कि हाल के अपने तीन दिवसीय ब्रिटेन दौरे में उपाध्यक्ष ने संस्थान के दस लाख रुपए ज़ाया कर डाले। संस्थान के अपने पूरे कार्यकाल में प्रो के बिजय कुमार भले ही बमुश्किल पाँच बार आगरा गए हों लेकिन विदेश जाने की दौड़ में सब से अधिक लाभ उठाकर उन्होंने सभी पुराने निदेशकों को पछाड़ दिया है। आपने कहीं सुना है कि किसी संस्थान का निदेशक परीक्षा के प्रश्नपत्र पहुँचाने के लिए चार लोगों के साथ विदेश गया हो? संस्थान के सालाना बजट का एक बहुत बड़ा भाग इन मँहगी और गैरजरूरी विदेश यात्राओं पर बढ़ा-चढ़ाकर खर्च किया जा रहा है।
और तो और संस्थान में क्लास पढ़ाने के नाम से कोसों दूर भागने के लिए बदनाम प्रो महेन्द्र राणा एवं प्रो रवि गुप्ता जैसे शिक्षक भी श्रीलंका में परीक्षा लेने के नाम पर वहाँ की रंगीनियों में डूबकी लगाने से नहीं परहेज करते। विदेश जाने का चस्का तो पूर्व परीक्षा नियंत्रक प्रो महेन्द्र को ऐसा लगा कि उन्होंने विदेश यात्रा के नाम पर ही अपने पद का सौदा फर्जी डिग्रीधारी रजिस्ट्रार से कर डाला। और इस तरह उन्होंने संस्थान में एडमिशन के इम्तहान के पर्चे बाज़ार में बेचने वाले त्रिपाठी गिरोह के बेलगाम घोड़े को अश्वमेघी अश्व बना दिया। किसी शिक्षण संस्थान में शायद ऐसा बिरले ही होता होगा कि दाखिले और परीक्षा के निहायत अकादमिक काम को कोई फर्जी डिग्रीधारी रजिस्ट्रार संचालित कर रहा हो। काबिले गौर यह है कि इस बाबत किसी ने भी मंत्रालय से इज़ाजत नहीं ली है। जानकारी मिली है कि संस्थान की विद्या सभा अब भेड़िया सभा में तब्दील हो गई है जहाँ ईमानदार प्रोफेसरों को कुख्यात गिरोह के भेड़ियों द्वारा सरेआम दॉंत निपोर कर डराया जाता है।
हवाई यात्रा करने की बीमारी संस्थान के शिक्षकों में इतनी फैल गई है कि संस्थान में पढ़ने-पढ़ाने से बहुत पहले तलाक ले कर फर्जीवाड़े और रिअल एस्टेट माफियाओं के कारोबार में शामिल हो चुके प्रो. भरत परमार और प्रो. सतवीर सिंह जैसे त्रिपाठी गिरोह के घोषित मेंबर आए दिन संस्थान के खर्चे पर हवाई जहाज में उड़ते नज़र आते हैं।
एक तरफ तो यु.पी.ए अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गाँधी जी और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी सरकारी दौरों में किफायत बरतने का फरमान सुना रहे हैं। तो दूसरी तरफ आवाम की ज़ुबान हिंदी से जुड़े हुक्मरान ही सरकार की नाफरमानी करने पर उतारू हैं। क्या मानव संसाधन विकास मंत्रालय इसकी सुधि लेगा, यह देखना अभी बाकी है।
